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Vishuddha Chakra

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Vishuddha Chakra

विशुद्ध चक्र के लिए हमारे योग शास्त्रों में बहुत कुछ कहा गया है। यह शरीरvके चक्र क्रम में पांचवा चक्र है।


विशुद्ध चक्र को कंठ चक्र भी कहा जाता है। इस शब्द का अभिप्राय संस्कृत में अशुद्ध्ता को शुद्ध करने को लेकर हैं। अब सायद चक्र में शुद्धि का अभिप्राय व्यक्ति के शारीरिक, आत्मिक व मन की शुद्धि से है जैसे आत्मा की सत्यता व्यक्त करना व श्वसन के समय शरीर के विषैले तत्व को बाहर निकाल कर प्राण वायु को भीतर प्रवेश करवाना है। विशुध्द चक्र के देवता सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी हैं जो व्यक्ति की चेतना के प्रतीक हैं। जब व्यक्ति ध्यान लगाता है और उसकी चेतना आकाश में समाहित हो जाती है तब उसे आत्मानुभूति से ज्ञान और बुद्धि प्राप्त होती है। इस चक्र में एक हाथीचन्द्रमा दर्शाया गया है जो विशाल मन का प्रतीक है। इस चक्र का रंग बैगनी है तथा इसका तत्व आकाश है व बीज मंत्र हं है।


विशुद्ध चक्र कंठ में स्थित गले के उभरे हुए भाग के ठीक नीचे स्थित होता है। योग शास्त्र के अनुसार यह कंठ स्थान देवी सरस्वती का माना गया है। यह चक्र सोलह पंखुडियों वाला कमल का फूल प्रतीत होता है क्योंकि यहाँ 16 नाड़ियाँ आपस में मिलती हैं (ये उन 16 शक्तिशाली कलाओं की प्रतीक भी हैं जीनके होने से व्यक्ति विकाश कर सकता है) I इनके मिलने से कमल की आकृति बनती है इस चक्र में 'अ' से 'अः तक सोलह ध्वनियां (स्वर) निकलती हैं। इस चक्र को हमेशा उर्जा से भरा होना चाहिये यह चक्र मनुष्य जीवन में बहोत ही महत्वपूर्ण होता है।



विशुद्ध चक्र का शरीर के अंग भाग पर प्रभाव

इस चक्र का शरीर के गले भाग पर पूर्ण प्रभाव होता है। इस चक्र के जागृत होते ही व्यक्ति को वाणी की सिद्धि प्राप्त होती है वह जो बोलता है वह सत्य हो जाता है। और ऐसा माता सरस्वती की कृपा होता है। व्यक्ति के आयु की वृद्धि होती है, संगीत विद्या की सिद्धि प्राप्त होती है, शब्द का ज्ञान होता है व्यक्ति विद्वान होता है। यह चक्र अपने अनुभवों के बारे में बोलने की तीव्र इच्छा शक्ति प्रदान करता है। यह चक्र श्रवण का भी केंद्र है और मनुष्य के सुनने की शक्ति इतनी विकसित कर देता है कि वह कानो से ही नहीं मन से भी सुनने लगता है।


यह चक्र व्यक्ति की प्रसन्नता की अनगिनत भावनाओं व स्वतंत्रता को दर्शाता है उसे यह ख़ुशी अपने योग्यता व कुशलता द्वारा प्राप्त होती है जो वाणी, गायन, स्पष्ट भाषण कला जो साफ सुथरी लय में होती है जो व्यक्ति के संतुलित विचार से ही संभव होती है।



विशुद्ध चक्र के दूषित होने पर होने वाली बीमारियाँ;

इस चक्र के दूषित होने पर होने वाली बीमारियां जैसे - थायरॉयड विकार, जुकाम और ज्वर संक्रमण मुंह व मसुढ़ों की तकलीफ , पीड़ा दायक गला, जबड़ा, जिह्वा, कन्धा, कान, और गर्दन सम्बन्धी रोग, उग्रता, हार्मोनल विकार, मनोदशा विकार, रजोनिवृत्ति जनित रोग, आदि होने की प्रबल सम्भावना होती है।


कमजोर चक्र फल स्वरूप - कमजोर संवाद, धीरे-धीरे बोलना, डरते हुए बोलना, बातों में हकलाहट होना कमजोर आवाज़ होती है। बात की सुरुवात करने में कठिनाई, बातचीत में शब्द का सही उपयोग न कर पाना तथा वह दुर्बल श्रोता भी हो सकता है ।


अति सक्रिय - विशुध्द चक्र की वजह से व्यक्ति बातें करते वक्त चिल्लाता है व उसके मुह से थूक के छीटे निकल सकते हैं। वह जब किसी से बात करता है तो सामने वाले को ठीक से न बोलने देता है न उसको ठीक से सुनता है बल्कि उसपर अधिकारपूर्ण वाणी से बातचीत करता है। आवाज ऊँची व कर्कश होती है जो कानो को चुभने वाली हो सकती है। वह आलोचनात्मक हो जाता हैं। और छोटी बात का अति विश्लेष्ण कर के प्रायः तिल का ताड बना देने जैसी भवनात्मक परेशानियाँ से युक्त हो जाता है।



विशुद्ध चक्र जगाने की सरल विधि

इस चक्र को संतुलित करने की लिए यह सरल उपाय है कि सर्व प्रथम शांत मन से शुद्ध होकर शांत कमरे में किसी आसन पे सुखासन में बैठ जाये और कंठ के पास बैगनी रंग की आभा की कल्पना करते हुए कंठ पे संयम करके गुन्जन (Vibration) से हं मन्त्र के नित्य जप से यह चक्र जागृत होने लगता है। और सुषुम्ना इस चक्र को भेदकर ऊपर की ओर उठने लगती है। इस सधना को करने वाले व्यक्ति को सदा सत्य बोलना चाहिए एवं संभव हो तो गायन कला का अभ्यास करना चाहिए, अपने इष्ट का मन्त्र जप करना भी लाभकारी होता है I नित्य गुलाब के पुष्प को सूंघने से भी इस को संतुलित करने में सहायता मिलती है।


मैंने अपने अनुभव में पाया है की Turquoise Stoneकि अगुठी, पेंडेंट, माला जो गले को स्पर्श करे, अथवा ब्रेसलेट अदि पहनने से यह चक्र संतुलित करने में मदत मिलती है। इसके अलावां फिरोजा व पन्ना रत्न भी धारण किया जा सकता है पर इन रत्नों को धारण करने से पूर्व अपने ज्योतिषी से सलाह ले लें



विशुद्ध चक्र का जीवन पर शुभ प्रभाव

इस चक्र के जागृत होने पर व्यक्ति को सोलह कलाओं और सोलह विभूतियों का ज्ञान प्राप्त हो जाता है । इसके जगृत होने से व्यक्ति अपने व्यवहार में अत्यन्त सत्यनिष्ठ, कुशल और मधुर हो जाता है और व्यर्थ के तर्क-वितर्क में नहीं फंसता, बिना अहम् को बढ़ावा दिए परिस्थितियों पर नियंत्रण करने में वह अत्यन्त युक्ति कुशल हो जाता है। इस चक्र का ध्यान करने से दिव्य दृष्टि, दिव्य ज्ञान, तथा समाज के लिए कल्याणकारी भावना पैदा होती है।



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।। इति शुभम् ।।

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