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Ajna Chakra

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Ajna Chakra

अजना चक्र के लिए हमारे योग शास्त्रों में बहुत कुछ कहा गया है। यह शरीर के चक्र क्रम में छठवां चक्र है।


अजना अर्थात आज्ञा चक्र इस चक्र को तीसरी आंख भी कहते हैं तथा इसे छठी इन्द्रीय भी मानते हैं I यहाँ शिव और शक्ति का संयुक्त रूप से वास है अर्थात इस चक्र में चेतना और प्रकृति शक्ति संयुक्त है I इसका तत्व मन का तत्व ( अनुपद तत्व ) है और इसका रंग हलके जमुनी रंग की सफेद आभा सा है। इसका बीज मंत्र है।


आज्ञा चक्र मस्तक के मध्य में भौहों के बीच स्थित है। इसे गुरुचक्र भी कहते है। ज्योतिष में आज्ञाचक्र बृहस्पति का केन्द्र है। यह चक्र मन और बुद्धि का मिलन स्थान है। इसी लिए इसे तीसरा नेत्र भी कहते हैं। आज्ञा चक्र स्पष्टता और बुद्धि का केंद्र है। यह मानव और दैवी चेतना के मध्य सीमा निर्धारित करता है। यह प्रमुख तीन नाड़ियों 1- इड़ा - चन्द्र नाड़ी २- पिंगला - सूर्य नाड़ी ३- सुषुम्ना - केंद्रीय, मध्य नाड़ी के मिलन का स्थान है। जब तीनो नाडियों की ऊर्जा यहाँ मिलती है और आगे उठती है, तब समाधी प्राप्त होती है, सर्वोच्च चेतना प्राप्त होती है। व्यक्ति अलौकिक हो जाता है। बौद्धिक रूप से सम्पन्नता प्राप्त होती है।


आज्ञा चक्र के प्रतीक चित्र में ९६ पंखुरी हैं जो दो मुख्य पंखुड़ियों में विभाजित एक कमल सी है यह दो पंखुरियां मानवीय चेतना ( धारणा, ज्ञान और स्पष्टता ) और परमात्मा के बीच की विभाजन रेखा है। आज्ञा चक्र आंतरिक गुरु का पीठ (स्थान) है। यह परिचायक है बुद्धि और ज्ञान का, जो आत्म चिंतन तथा आत्मिक जागरूकता का, सामान्य तौर पर कहा जाये तो जिस व्यक्ति की ऊर्जा यहाँ ज्यादा सक्रिय है उसे देव शक्ति का अनुभव होने लगता है। । तथा उसे दिव्य दृष्टि की प्राप्ति होती है।



अजना चक्र का शरीर के अंग भाग पर प्रभाव

आज्ञा चक्र का शरीर में दोनों भौहों के मध्य का स्थान है। जहाँ सामान्य तौर पे स्त्रियाँ बिंदी लगाती हैं। जब यह चक्र कम गति पे कार्य करता है तब व्यक्ति की याद करने की शक्ति कमजोर होती है, उसे कुछ नया सिखने में समस्या आती है, कल्पना शक्ति कमजोर होती है वह किसी चीज का अनुमान ठीक से नहीं लगा पाता, लोगों के प्रति कम संवेदनशील होता हैं, सहज ज्ञान का आभाव होता है, ज्यादा दिमांक पे जोर नहीं डाल पाता तथा नींद ज्यादा आती है । विद्या अध्यन करने वाले जातक का यह चक्र शुद्ध होना चाहिये।


और जब यह चक्र दूषित व असामान्य गती पर कार्य करने लगता है तो व्यक्ति कल्पना की दुनियां में जीने लगता है भले उनकी काल्पना वास्तविकता से कितनी भी दूर क्यों न हो, वह पूर्वाग्रही हो जाता हैं, मानसिकता सख्त हो हो जाती है, यह अति आलोचनात्मक हो सकता हैं, किसी के प्रति सहानुभूति नहीं दर्शा पाता, जल्दी ही विचलित भी हो जाता हैं, किसी भी स्थिति में तुरंत चिंताग्रस्त हो जाता हैं, बुरे स्वप्नों से परेसान रहता हैं, आदेश देने की प्रवित्ति बढ़ जाती है, एसे व्यक्तियों को अत्यधिक गुस्सा भी अता हैं तथा अत्यधिक जिद्दी भी होता हैं व मतिभ्रम की स्थिति होती हैं I



अजना चक्र के दूषित होने पर होने वाली बीमारियां

इस चक्र के दूषित होने पर शरीर में निम्न बीमारियां उत्पन्न होने की सम्भावना होती है। आधा सीसी का दर्द, मतिभ्रम, जुकाम हमेशा नाक का असमान्य रूप से भरी रहना, ज्वर, हार्मोनल विकार, मनोदशा विकार, आँखं का अस्वस्थ्य रहना, तंत्रिका तंत्र (Nervous System) तथा पिट्यूटरी ग्रंथि (Pituitary Gland) व शीर्ष ग्रंथि (Pineal Gland) का अनियंत्रित होना, साइनस(साइनोसाइटिस), व माथा सम्बंधित अनेक रोग होने कि प्रबल सम्भावना होती है।



अजना चक्र जगाने की साधरण विधि

सर्व प्रथम शांत मन से तथा शुद्ध होकर शांत कमरे में किसी आसन पे सुखासन में बैठ जाये और भृकुटि के मध्य ( भौहों के बीच ) ध्यान लगाते हुए वहां हल्के नीले रंग की आभा की कल्पना करते हुए अपने रिश्तों और उनसे जुडी खुशियों पर सकारात्मक विचार मन में रखते हुए मन्त्र का उच्चारण नित्य करते रहने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है। तथा माथे पर केशर का टिका नित्य लगाने से भी लाभ होता है। तथा इस  चक्र में लाभ के लिए गंगा जल का टिका भी लाभदायक है अथवा बहते हुए निर्मल जल को निहारना भी एक अच्छा विकल्प हो सकता है।


मैंने अपने अनुभव में पाया है की Lapis Lazuli Stone कि अगुठी, पेंडेंट, माला, अथवा ब्रेसलेट अदि पहनने से यह चक्र संतुलित करने में मदत मिलती है।



अजना चक्र का जीवन पे शुभ प्रभाव

इसका चक्र के जागरण का प्रभाव यहाँ अपार शक्तियां और सिद्धियां निवास करती हैं। इस आज्ञा चक्र का जागरण होने से ये सभी शक्तियां जाग पड़ती हैं। व्यक्ति आकर्षक तथा अंतर्ज्ञानी हो जाता है स्मरण शक्ति अच्छी हो जाती है वह दिव्य दृष्टा हो जाता है अर्थात वह सिद्धपुरुष बन जाता है। चक्र विज्ञान में इड़ा´ नाड़ी को गंगा और ´पिंगला´ नाड़ी को यमुना और इन दोनों नाड़ियों के बीच बहने वाली सुषुम्ना नाड़ी को सरस्वती कहते हैं। इन तीनों नाड़ियों का जहां मिलन होता है, उसे त्रिवेणी कहते हैं। अपने मन को इस त्रिवेणी में जो स्नान कराता है अर्थात इस चक्र पर ध्यान करता है, उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।



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।। इति शुभम् ।।

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