औरा का मतलब होता है “प्राण उर्जा” अर्थात आभामण्डल, अगर वैदिक दृष्टि से देखें तो आभामंडल एक ऐसी तेजतत्व चमक है जो किसी भी व्यक्ति अथवा वस्तु के मध्य से आंतरिक ऊर्जा को सृजित करके उसके चेहरे अथवा ऊपरी भाग पर प्रभावपूर्ण चमक के रूप में दिखाई देता है। औरा शब्द को लैटीन भाषा मे “सदैव बहने वाली हवा” कहते हैं। अपने इसी अर्थ के मुताबिक यह सदैव गतिशील भी होती है। विभिन्न देशो मे इसे विभिन्न नामो से जाना जाता है, लेकिन सबसे ज्यादा प्रचलित नाम औरा, प्रभामंडल है।
अक्सर हम हमारे ऋषि-मुनि, देवी-देवताओं के स्वरूप में यही आभामंडल देखते हैं, जो उनके चित्र में सर के पीछे सप्तरंगीय ऊर्जा तरंगे सी निष्कासित होती रहती हैं व सूर्य प्रकाश के गोले सा प्रतिबिंब रहता है। यही उनका आभामण्डल या औरा चक्र होता है। यह आभामण्डल हम सभी जीवित प्राणियों, जीव-जंतु, पेड़-पौधे, निर्जीव वस्तुओं में भी एक प्रकाश पुंज के रूप में मौजूद रहता है। यह अवश्य है कि किसी में कम और किसी में ज्यादा होता है। उदाहरण स्वरूप ताजे फल एवं सब्जियों को ही लें, उनमें शुरू में जो चमक रहती है उनमे जो आकर्षण रहता है समय बीतने पर फीका पड़ जाता है।
वैसे ही जिस व्यक्ति की औरा ज्यादा होती है तो वह व्यक्ति अपने आत्मविश्वास और चुम्बकीय आकर्षण शक्ति की वाजह से लोगों को सहज ही प्रभावित कर पाता है, समाज मे उसकी बातों को सुना जाता है, लोग उसका अनुसरण सहज ही करने लगते हैं, ज्यादातर वह स्वस्थ्य होता है पर संयोग बस अस्वस्थ्य होने पर दवाइयां उसपर आसानी से और जल्दी काम करती हैं जिससे वह जल्दी ही स्वस्थ्य हो जाता है, हर प्रकार की स्थिति में वह अन्य की तुलना में ज्यादा अच्छा कर पाता है। वह देखने मे साधारण हो सकता है। वहीं दूसरी तरफ एक हट्टा-कट्टा और सजीला सा व्यक्ति भी लोगों की नजरों में नहीं चढ़ पाता लोग उसकी किसी बात को पसंद नहीं करते, वह अपना कोई भी प्रभाव लोगों पर नही छोड़ पता अर्थात उसका आभामण्डल क्षीण हो चुका होता हैं। आइये जानने की कोशिश करते हैं ऐसा क्यों होता है?
प्रायः जब हम बच्चे होते हैं तो हमारी “औरा” अर्थात आभामण्डल भरपूर होता है पर जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं अनाप-शनाप खान-पान, हमारी बुरी आदतें, भौतिक सुख-सुविधा के साधन जैसे- मोबाईल, इलेक्ट्रिक एवं इलेक्ट्रोनिक्स साधन की चीजें जो एक नकारात्मक शक्ति (नेगेटिव मैग्नेटिक ऊर्जा का उत्सर्जन)? कर विकिरण पैदा करती हैं, मोबाईल, फ्रीज, एसी, टी.वी., कंप्यूटर आदि से एक प्रकार की नकारात्मक (नेगेटिव) ऊर्जा निकलती है जो धीरे-धीरे हमारे शरीर व मन-मस्तिष्क को छतिग्रस्त करती रहती हैं तथा हमारी प्राकृतिक “औरा” आभामण्डल को आहिस्ता-आहिस्ता समाप्त कर देती है।
इनके अलावा एक और बड़ी नकारात्मक शक्ति भी है जो हमारी इस प्राकृतिक ऊर्जा को तेजी से छतिग्रस्त करने में प्रभावी है वह है जियोपैथीक स्ट्रेस यह धरती के गर्भ से आने वाला एक ऐसा नुकसानदायक रेडिएशन है जिसकी उत्पत्ति का कारण भूगर्भ में धरती की चट्टानों के खिसकने, पानी के भूमिगत स्रोत के बहाव से उत्पन्न ऊर्जा. जो दाब के करण दूषित हो जाती है अथवा भूमिगत जल के बड़े स्रोत या ऐसे कई अन्य कारण हो सकते हैं। इस नकारात्मक ऊर्जा का बहाव अगर हमारे घर मे हमारे सोने के स्थान से होकर गुजरता है तो धीरे-धीरे हमारी सकारात्मक ऊर्जा को दूषित कर हमारी औरा को समाप्त कर देता है। और हम बीमार, चिड़चिडेपन एवं अवसाद में घिर जाते हैं।
जियोपैथीक स्ट्रेस एक लैटिन शब्द है जिओ अर्थात “जमीन” पैथीक अर्थात “बीमारी” यह नकारात्मक दूषित ऊर्जा लंबवत जमीन से उत्सर्जित होकर वनस्पति तथा वस्तु के साथ-साथ हमारे शरीर का Immune System कमजोर कर देती है जिससे हमारी रोग- प्रतिरोधक छमता कमजोर हो जाती है। परिणाम स्वरूप कैंसर, हार्ट प्रॉब्लम, ज्वाइंट पेन, किडनी प्रॉब्लम, शुगर, लिवर, उच्च रक्तचाप, आदि अथवा Depression मानसिक परेसानी, दौरे पड़ने जैसी भयंकर बीमारियां हमें घेर लेती हैं। वहीं हमारे घर मे बच्चों का बिना मतलब क्रोध करना, नींद में चलना, बिस्तर पर पेशाब करना, घड़ी के कांटों की तरह बिस्तर में घूमना, पढ़ाई या काम में मन न लगना, नशा करना अथवा गलत संगत में पड़ने जैसी भयंकर परेशानियां घर में पैर पसारने लगती हैं । अर्थात यह जियोपैथीक स्ट्रेस वास्तु दोष के रूप में हमारे घर मे कार्य करता है और हमे अंदर से खोखला करता रहता है।
जिन घरों में चीटियां ज्यादा दिखाई देती हैं, बिल्लियों का ज्यादा आना जाना रहता है, मधुमक्खी के छत्ते व दीमक पाई जाती हैं, आम तौर पर ऐसे घर G.S अर्थात जियोपैथीक स्ट्रेस बाधित होते हैं। साधारण भाषा मे कहा जाए तो ऐसे घर के नीचे से जियोपैथीक लाइन गुजर रही होती है अथवा वहां पर इस तरह की दो लाइने एक दूसरे को काटती हैं। अर्थात इनका चार रास्ता बनता है। यह घर के साथ-साथ आॅंफिस, दुकान, फैक्ट्री में भी यह नकारात्मक ऊर्जा लाइन हो सकती है जो कैस काउंटर के नीचे से, प्रबंधक अथवा किसी भी कार्यरत व्यक्तिके बैठने के स्थान के नीचे से, फैक्ट्री में महत्वपूर्ण मशीनों के नीचे से गुजरती हो तो वहाँ पे भयंकर मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। व्यक्ति अपना कार्य उचित ढंग से न कर पायेगा, मशीने ज्यादातर खराब ही पड़ी रहेंगी। अतः ऐसी नकारात्मक ऊर्जा की जांच किसी कुशल भूगर्भ विज्ञानी वास्तुशास्त्री से करवानी चाहिए और इसका उचित परिशोध करवाना चाहिए। जिससे व्यक्ति अथवा स्थान को शुभ ऊर्जा से परिपूर्ण किया जा सके।

इस नकारात्मक शक्ति नेगेटिव एनर्जी अर्थात जियोपैथीक स्ट्रेश की जांच आज के युग मे हमारे महान वैज्ञानिकों ने आसन कर दी है उन्होंने “औरा स्कैनर” नामक एक आधुनिक यंत्र ईजाद कर लिया है जिसकी सहायता से एक वास्तुशास्त्री कुशलता पूर्वक एवं प्रामाणिक रूप से वस्तु एवं व्यक्ति का आभामण्डल जांच सकते हैं। यह “औरा स्कैनर” कंपन और कोणीय दिशा गति के माध्यम से सटीक औरा प्रतिपादित करता है जिससे संबंधित व्यक्ति, वस्तु तथा स्थान का सुलभ उपचार करना संभव हो पाता हैं। क्यों कि आज का इन्सान सच्ची खुशी और शान्ति के लिये दर-दर भटकता है, जैसे ही वह अपने औरा ( आभामण्डल ) के बारे में जानता है तो उसको पता चलता है कि सारी ऊर्जाये उनके अन्दर ही है, इसी ऊर्जा से उसको सच्ची खुशी, प्यार शान्ति का अहसास होता है। वास्तुशास्त्री द्वारा बताए गए प्रभवशाली उपचार माध्यमों से पुनः अपनी औरा ( Aura ) आभामण्डल को बलवान कर के जीवन को हर प्रकार से सुखमय बनाया जा सकता है।